गौतम चौधरी
पश्चिम एशिया में 7 अगस्त को हुआ मक्का समझौता पहली नजर में तीन देशों-सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान, के बीच हुआ एक रक्षा समझौता भर दिखाई देता है। पहली नजर में यह जो भी दिखे लेकिन इसके पीछे की परिस्थितियों और इसके संभावित दूरगामी परिणामों को देखें तो यह समझौता उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह उस पश्चिम एशियाई सुरक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन का संकेत हो सकता है, जो दशकों से अमेरिकी प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
समझौते के अनुसार, तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। अभी इस समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसलिए इसकी वास्तविक सैन्य प्रतिबद्धताओं और संस्थागत स्वरूप को लेकर बहुत कुछ स्पष्ट होना बाकी है। फिर भी, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान और तुर्किये को एक साथ जोड़ने का फैसला किया है।
इसे कुछ विश्लेषक ‘इस्लामिक नाटो’ कह रहे हैं लेकिन यह उपमा फिलहाल आकर्षक अधिक है और तथ्यात्मक कम। नाटो केवल पारस्परिक रक्षा की घोषणा नहीं है। उसके पास साझा कमान, सैन्य योजना, संयुक्त ढांचा और दशकों में विकसित संस्थागत व्यवस्था है। मक्का समझौते में अभी ऐसा कोई ढांचा दिखाई नहीं देता।
फिर भी इसे मामूली समझौता मानना भी भूल होगी। इस समझौते की पहली जड़ सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता में है। पिछले वर्षों में खाड़ी क्षेत्र ने यह देखा है कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के बावजूद क्षेत्रीय शक्तियां पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। ईरान के साथ तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और क्षेत्र में लगातार बढ़ती अस्थिरता ने रियाद को यह सोचने पर मजबूर किया है कि अपनी सुरक्षा के लिए केवल एक बाहरी शक्ति पर निर्भर रहना समझदारी नहीं है।
यही कारण है कि सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया और अब उसमें तुर्किये को जोड़ दिया गया है। यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है-सऊदी अरब अब केवल अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का उपभोक्ता नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए एक बहुस्तरीय विकल्प तैयार कर रहा है।
यही इस समझौते का सबसे बड़ा संदेश है। पाकिस्तान को मिला अप्रत्याशित रणनीतिक अवसर
इस समीकरण में पाकिस्तान की भूमिका शायद सबसे अधिक दिलचस्प है। सऊदी अरब के पास धन, ऊर्जा और आर्थिक प्रभाव है। तुर्किये के पास बड़ा सैन्य ढांचा, ड्रोन तकनीक और विकसित होता रक्षा उद्योग है। पाकिस्तान के पास बड़ी सेना, युद्ध का अनुभव और परमाणु क्षमता है।
तीनों को एक साथ रखिए तो एक ऐसा सुरक्षा संयोजन बनता है, जिसमें आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति और रक्षा तकनीक एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं। पाकिस्तान के लिए इसका अर्थ केवल सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग नहीं है। यह उसे व्यापक मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर देता है।
अब वह स्वयं को केवल भारत-केंद्रित दक्षिण एशियाई सैन्य शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि मुस्लिम देशों के व्यापक सुरक्षा विमर्श के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। यही वह बिंदु है जिसे भारत को सबसे गंभीरता से देखना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम व परिदृष्यों में सबसे दिलचस्प बात शायद यह है कि ईरान समझौते में नहीं है लेकिन उसकी अनुपस्थिति के बावजूद पूरा समीकरण ईरान के संदर्भ के बिना समझा नहीं जा सकता। सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से पश्चिम एशिया में प्रभाव के दो महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। तुर्किये और ईरान के संबंध भी सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों से भरे हैं। पाकिस्तान ईरान का पड़ोसी है लेकिन सऊदी अरब का महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार भी।
इसलिए तीनों देशों का एक सुरक्षा ढांचा बनना स्वाभाविक रूप से तेहरान की रणनीतिक गणना को प्रभावित करेगा। फिर भी इसे सीधे ‘ईरान-विरोधी गठबंधन’ कहना जल्दबाजी होगी। तीनों देशों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है। ईरान ने भी तत्काल इसे खतरे के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संयमित प्रतिक्रिया दी है।
यह संयम अपने आप में महत्वपूर्ण है। संभव है कि तेहरान समझ रहा हो कि मक्का समझौते का तत्काल उद्देश्य उसके खिलाफ युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय देशों का अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाना है। वैसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी समझौते का घोषित उद्देश्य और उसका वास्तविक रणनीतिक प्रभाव हमेशा एक जैसा नहीं होता।
इस पूरे मामले में अमेरिका को नजरअंदाज करना विश्लेषण को एक पक्षीय बना देता है। इसलिए अमेरिका की चर्चा जरूरी हो जाता है। जानकारों के बीच चर्चा यह भी है कि इस समझौते के पीछे अमेरिकी कूटनीति काम कर रही है। यहीं सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है।
ईरान पर अमेरिकी-इजराइली सैन्य अभियान के बाद मुस्लिम देशों में अमेरिकी नीति के प्रति अविश्वास बढ़ा है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे देश भी यह महसूस कर सकते हैं कि भविष्य की सुरक्षा के लिए केवल अमेरिकी संरक्षण पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण है।
इसलिए मक्का समझौते को अमेरिकी प्रभाव से दूरी की कोशिश के रूप में देखना स्वाभाविक है। इसके उलट एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है-क्या अमेरिका इस नए सुरक्षा ढांचे का विरोध करेगा?
संभव है कि नहीं। अमेरिकी रणनीति के लिए यह व्यवस्था कुछ मायनों में उपयोगी भी हो सकती है। यदि क्षेत्रीय शक्तियां स्वयं एक-दूसरे के संतुलन का काम करें तो अमेरिका को हर संकट में सीधे सैन्य हस्तक्षेप करने की आवश्यकता कम हो सकती है। ईरान को बिना सीधे अमेरिकी युद्ध के क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में बांधकर रखना भी वॉशिंगटन के हित में हो सकता है।
इसलिए यह कहना कि ‘मक्का समझौता अमेरिका की योजना है’, फिलहाल प्रमाण के बिना निष्कर्ष होगा लेकिन यह संभावना जरूर विचारणीय है कि अमेरिका इस समझौते को अपने हितों के अनुरूप ढालने की कोशिश करे। किसी व्यवस्था को अमेरिका ने बनाया हो, यह जरूरी नहीं कि वह व्यवस्था अमेरिका के लिए उपयोगी न हो।
इजराइल का मौन रहना भी इस मामले में रहस्य पैदा कर रहा है। इस समीकरण को इजराइल से अलग करके देखना ठीक नहीं रहेगा। ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना को पूरी तरह बदल दिया है। सऊदी अरब सार्वजनिक रूप से ईरान-विरोधी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहता लेकिन वह ईरान की सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर चिंतित जरूर है।
इसी तरह तुर्किये इजराइल की नीतियों का मुखर आलोचक रहा है लेकिन वह नाटो का सदस्य भी है और पश्चिमी सुरक्षा संरचना से पूरी तरह बाहर नहीं हुआ है। यानी यह नया गठबंधन एक असाधारण विरोधाभास से भरा है-इसके सदस्य अमेरिका और इजराइल की कई नीतियों से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी अपनी सुरक्षा गणनाएं अंततः उसी व्यापक पश्चिम एशियाई शक्ति-संतुलन से प्रभावित हैं जिसमें अमेरिका और इजराइल महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं।
मक्का समझौते का एक और महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित पहलू चीन भी है। सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों चीन के महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार हैं। चीन ने सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध सामान्य कराने में भी मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। तुर्किये के साथ भी चीन के आर्थिक संबंध बढ़ रहे हैं। ऐसे में एक नया क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनता है तो बीजिंग को उसे नजरअंदाज करने का कोई कारण नहीं होगा।
यहां एक नई संभावना पैदा होती है-क्या पश्चिम एशिया में सुरक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे अमेरिकी प्रभुत्व से हटकर ऐसी बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जिसमें अमेरिका, चीन, रूस और क्षेत्रीय शक्तियां समानांतर प्रभाव डालें? यदि ऐसा होता है तो मक्का समझौता केवल ‘मुस्लिम सैन्य गठबंधन’ नहीं रह जाएगा। वह उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का एक क्षेत्रीय प्रयोग बन सकता है।
भारत को इस घटनाक्रम को धार्मिक चश्मे से देखने की सबसे कम जरूरत है। सऊदी अरब के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंध पिछले वर्षों में मजबूत हुए हैं। ईरान भारत के लिए चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया तक पहुंच और अफगानिस्तान के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। तुर्किये के साथ भारत के संबंधों में मतभेद हैं लेकिन संवाद में कोई रुकावट नहीं है।
दूसरी ओर पाकिस्तान इस नए सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह सऊदी अरब और ईरान के बीच किसी एक पक्ष को चुनने के दबाव से बचे। भारत की ताकत उसकी बहुपक्षीय कूटनीति में है।
नई दिल्ली को सऊदी अरब से संबंध मजबूत करते हुए ईरान के साथ भी संवाद बनाए रखना होगा और तुर्किये के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को संचालित करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि भारत पाकिस्तान को मुस्लिम दुनिया के एकमात्र सुरक्षा-प्रतिनिधि के रूप में स्थापित होने का अवसर न दे। इस पूरे मामले पर भारत को सतर्क रहना चाहिए।
मक्का समझौते को ‘इस्लामिक नाटो’ कहना मीडिया के लिए आकर्षक हो सकता है लेकिन रणनीतिक विश्लेषण के लिए यह पर्याप्त नहीं है। अभी हमारे सामने एक ऐसा समझौता है, जिसमें तीन देश पारस्परिक सुरक्षा का आश्वासन दे रहे हैं। आगे यदि इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग, रक्षा उत्पादन, वायु रक्षा, साझा कमान और अन्य देशों की भागीदारी जुड़ती है, तभी इसे एक वास्तविक सैन्य गठबंधन की दिशा में बढ़ता हुआ माना जा सकेगा।
इससे पहले भी इसका राजनीतिक महत्व कम नहीं है। यह समझौता संकेत दे रहा है कि पश्चिम एशिया के प्रमुख मुस्लिम देश अब अपनी सुरक्षा को केवल वाशिंगटन के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते। विडंबना यह है कि यही प्रक्रिया अमेरिका के लिए चुनौती भी बन सकती है और अवसर भी।
यदि अमेरिका इस व्यवस्था को अपने प्रभाव से बाहर जाता हुआ देखता है, तो वह इसे रोकने का प्रयास करेगा। यदि वह समझता है कि यह व्यवस्था ईरान को संतुलित करने, क्षेत्रीय अस्थिरता को नियंत्रित करने और अमेरिकी प्रत्यक्ष सैन्य बोझ घटाने में मदद कर सकती है, तो वह इसके साथ काम करने का रास्ता तलाश सकता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि मक्का समझौता अमेरिका के खिलाफ है या अमेरिका के पक्ष में। असली सवाल यह है कि अमेरिका इस बदलती व्यवस्था को अपने पक्ष में मोड़ पाएगा या नहीं। इसके साथ एक दूसरा सवाल भी जुड़ा है-क्या ईरान इस नए सुरक्षा ढांचे के बाहर रहकर भी उसे प्रभावित करने की क्षमता बनाए रखेगा?
पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन अब केवल सऊदी अरब बनाम ईरान या अमेरिका बनाम चीन नहीं रहा। यहां कई शक्ति-केंद्र एक-दूसरे को संतुलित करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। मक्का समझौता इसी बदलती दुनिया का संकेत है। इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहकर रोमांचित होने के बजाय यह देखना अधिक जरूरी है कि इसके भीतर कौन किसे संतुलित कर रहा है और अंततः इस नए संतुलन का लाभ किसे मिलने वाला है।
