गौतम चौधरी
इतिहास में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर किसी एक शिलालेख, किसी एक ग्रंथ या किसी एक पुरातात्त्विक खोज से नहीं मिलता। वह प्रश्न लंबे समय तक अनुत्तरित रहता है। उस प्रश्न के वास्तविक उत्तर के लिए अनेक बिखरे साक्ष्यों, व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक परंपराओं और भाषाई स्मृतियों को एकत्रित कर बेहद बारीकी से एक-एक कड़ी को जोड़ना पड़ता है। इसके बाद ही धीरे-धीरे उत्तर आकार लेने लगता है। बिहार के भागलपुर स्थित प्राचीन चंपानगर और मध्य वियतनाम के चंपा राज्य के बीच संबंध भी ऐसा ही एक प्रश्न है।
पहली दृष्टि में यह केवल नामों का संयोग प्रतीत हो सकता है। एक ओर गंगा तट पर स्थित अंग महाजनपद की राजधानी चंपा और दूसरी ओर दक्षिण चीन सागर के तट पर विकसित भारतीय संस्कृति से अनुप्राणित चंपा साम्राज्य। दोनों के बीच लगभग तीन हजार किलोमीटर की दूरी, अलग भूगोल और भिन्न राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं। फिर भी दोनों के नाम समान क्यों हैं? क्या यह केवल संयोग है, या इसके पीछे समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक प्रसार और भारतीय प्रवासन का कोई गहरा इतिहास छिपा है?
यह प्रश्न नया नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी से फ्रांसीसी, ब्रिटिश और वियतनामी इतिहासकार दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन करते रहे हैं। संस्कृत अभिलेख, शिव और विष्णु के मंदिर, भारतीय राजकीय उपाधियाँ और ब्राह्मी से विकसित लिपियाँ इस प्रभाव के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। किंतु जब चंपा नाम की उत्पत्ति का प्रश्न आता है, तो इतिहासकारों के बीच मतभेद दिखाई देते हैं। कुछ इसे संस्कृत के चंपक (Champaka) पुष्प से जोड़ते हैं, जबकि कुछ यह संभावना व्यक्त करते हैं कि यह नाम भारत के किसी प्रतिष्ठित नगर-विशेषतः अंगदेश के चंपानगर की स्मृति का परिणाम हो सकता है। अभी तक ऐसा कोई अभिलेख नहीं मिला है जो इस संबंध को अंतिम रूप से सिद्ध कर दे; इसलिए इस विषय पर कोई भी निष्कर्ष सावधानी से ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
यही सावधानी किसी कथा या मिथक को इतिहास बना देता है। आज का भागलपुर कभी प्राचीन अंग महाजनपद का हृदय था। वैदिक साहित्य, महाभारत, पाली त्रिपिटक, जैन आगम और बाद के संस्कृत ग्रंथों में चंपा को एक समृद्ध नगरी, व्यापारिक केंद्र और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बौद्ध साहित्य में इसका वर्णन गंगा के तट पर बसे ऐसे नगर के रूप में मिलता है जहाँ दूर-दराज़ के व्यापारी आते थे। जैन परंपरा इसे बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य की जन्मस्थली मानती है। इस प्रकार चंपा केवल एक राजधानी नहीं था, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक और धार्मिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र भी था।
उधर, दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास मध्य वियतनाम में एक नया राज्य उभरता है। चीनी इतिहासकार उसे प्रारंभ में लिन-यी (स्पद-लप) कहते हैं। किंतु चौथी शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते वहीं के शिलालेख संस्कृत में लिखे जाने लगते हैं और राज्य स्वयं को चंपा के नाम से प्रस्तुत करता है। उसके राजा भद्रवर्मन, रुद्रवर्मन, हरिवर्मन और इन्द्रवर्मन जैसे विशुद्ध संस्कृत नाम धारण करते हैं। शिवलिंग स्थापित किए जाते हैं। संस्कृत में दानपत्र लिखे जाते हैं। भारतीय पंचांग, राजकीय उपाधियाँ और मंदिर स्थापत्य वहाँ की पहचान बन जाते हैं। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं था; इसके पीछे कई शताब्दियों के समुद्री संपर्क, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी थी।
यहीं से यह ऐतिहासिक जिज्ञासा जन्म लेती है-क्या यह वही चंपा है जिसकी स्मृति कभी गंगा किनारे बसे अंगदेश के समृद्ध नगर से जुड़ी थी? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें उन समुद्री मार्गों पर लौटना होगा जिन पर भारतीय व्यापारी, नाविक, ब्राह्मण, बौद्ध भिक्षु और शिल्पी बंगाल की खाड़ी पार कर सुवर्णभूमि और उससे आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचते थे। आज जब हम मानचित्र पर भारत और वियतनाम को दो अलग-अलग राष्ट्रों के रूप में देखते हैं, तब यह कल्पना करना कठिन लगता है कि दो हजार वर्ष पहले समुद्र विभाजन का नहीं, बल्कि संपर्क का माध्यम था। गंगा का जल ताम्रलिप्ति के बंदरगाह तक पहुँचता था और वहाँ से व्यापारिक जहाज़ मानसूनी पवनों के सहारे मलय प्रायद्वीप, कंबुज, जावा और चंपा की ओर निकल पड़ते थे।
इतिहास के इस व्यापक परिदृश्य में ‘चंपा’ केवल एक नगर या राज्य का नाम नहीं रह जाता; वह भारतीय समुद्री सभ्यता की संभावित सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक बन जाता है। किंतु किसी भी ऐतिहासिक परिकल्पना को प्रमाणों की कसौटी पर कसना आवश्यक है। इस लेख का उद्देश्य किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष को स्थापित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध ग्रंथों, पुरातात्त्विक खोजों, संस्कृत अभिलेखों, चीनी इतिहासों और आधुनिक शोधों के आधार पर इस प्रश्न की निष्पक्ष पड़ताल करना है।
यदि अंत में यह सिद्ध हो कि दोनों चंपाओं का संबंध केवल नाम तक सीमित था, तो भी वह निष्कर्ष उतना ही महत्त्वपूर्ण होगा जितना यह सिद्ध होना कि उनके बीच कोई ऐतिहासिक सूत्र था। इतिहास का काम विश्वास पैदा करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर सत्य के अधिक निकट पहुँचना है।
इसी दृष्टि से हम इस यात्रा की शुरुआत करेंगे-गंगा के किनारे बसे प्राचीन चंपानगर से, जिसने कभी अंगदेश की राजधानी के रूप में भारतीय इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। अगले भाग में हम वैदिक, बौद्ध, जैन और यूनानी स्रोतों के आलोक में उस चंपा को खोजेंगे, जिसके बिना वियतनाम के चंपा की कहानी अधूरी है।
