गौतम चौधरी
भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के सामने आज सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, तकनीकी भी नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है। एक समय था जब अख़बार की सुर्खियाँ और रात नौ बजे का समाचार बुलेटिन जनता के लिए सत्य का सबसे विश्वसनीय स्रोत माने जाते थे। आज वही दर्शक एक ही समाचार को कई मंचों पर देखकर उसकी सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे हैं। यह परिवर्तन केवल तकनीक का परिणाम नहीं है; यह पत्रकारिता की बदलती प्रकृति योज्ञता व अहर्ता के बदलते मापदंड, राजनीतिक दबाव, सांस्कृतिक एवं पांथिक ध्रुवीकरण, कॉरपोरेट प्रभाव और डिजिटल माध्यमों के विस्फोट का संयुक्त परिणाम है।
पिछले एक दशक में भारतीय मीडिया के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है। टेलीविजन की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। अब समाचार केवल न्यूज़ रूम से नहीं, बल्कि लाखों सोशल मीडिया खातों, यूट्यूब चौनलों और स्वतंत्र पत्रकारों के माध्यम से भी लोगों तक पहुँच रहा है। सूचना का यह लोकतंत्रीकरण अपने आप में सकारात्मक है लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी पैदा हुई है-सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।
मुख्यधारा का मीडिया भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं है। दर्शकों के एक बड़े वर्ग में यह धारणा बनी है कि अनेक समाचार संस्थान किसी न किसी राजनीतिक या वैचारिक पक्ष के निकट दिखाई देते हैं। यह धारणा सही हो या गलत लेकिन पत्रकारिता के लिए स्वयं इसका अस्तित्व ही चिंता का विषय है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूँजी उसकी निष्पक्षता नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देने की क्षमता भी होती है। जब जनता यह मानने लगे कि समाचार का चयन, उसकी भाषा और प्रस्तुति किसी पूर्वनिर्धारित दृष्टिकोण से प्रभावित है, तब विश्वास का क्षरण शुरू हो जाता है।
इस संकट का एक बड़ा कारण समाचार का धीरे-धीरे ‘प्रदर्शन’ (Performance) में बदल जाना भी है। कभी समाचार बुलेटिन का केंद्र संवाददाता और तथ्य होते थे; आज कई बार केंद्र में एंकर का व्यक्तित्व, उसकी शैली और बहस की नाटकीयता होती है। शोर, आरोप-प्रत्यारोप और ऊँची आवाज़ कई बार तथ्यों पर भारी पड़ जाती है। इससे समाचार और मनोरंजन के बीच की दूरी कम होती गई है। दर्शक क्षणिक रूप से आकर्षित तो होता है लेकिन दीर्घकाल में उसका भरोसा कम होने लगता है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने इस समस्या को और जटिल बनाया है। पहले टीआरपी की दौड़ थी, अब एल्गोरिदम का दौड़ है। सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफ़ॉर्म उस सामग्री को अधिक बढ़ावा देते हैं जो लोगों को अधिक देर तक रोके, अधिक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करे और अधिक साझा की जाए। ऐसे वातावरण में संतुलित और जटिल विश्लेषण की तुलना में भावनात्मक, सनसनीखेज और टकरावपूर्ण सामग्री अधिक तेजी से फैलती है। यह दबाव केवल स्वतंत्र यूट्यूब चौनलों पर नहीं, बल्कि मुख्यधारा के मीडिया पर भी पड़ता है।
एक अन्य गंभीर प्रश्न मीडिया के आर्थिक मॉडल से जुड़ा है। अधिकांश समाचार संस्थान विज्ञापन-आधारित व्यवस्था पर निर्भर हैं। विज्ञापन, दर्शक संख्या और डिजिटल क्लिक की प्रतिस्पर्धा संपादकीय निर्णयों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकती है। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर मीडिया संस्थान ऐसा करता है लेकिन यह जोखिम आज पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। पत्रकारिता तब सबसे अधिक स्वतंत्र होती है, जब उसकी आर्थिक संरचना भी अपेक्षाकृत स्वतंत्र हो।
हालाँकि इस पूरी तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। यह कहना कि केवल मुख्यधारा का मीडिया ही संकट में है, वास्तविकता का अधूरा चित्र होगा। डिजिटल मीडिया में भी अपुष्ट दावों, आधी-अधूरी सूचनाओं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित भ्रामक सामग्री (डीपफेक) और बिना संपादकीय उत्तरदायित्व के प्रसारित होने वाली खबरों की संख्या बढ़ी है। इसलिए चुनौती केवल पारंपरिक मीडिया के सामने नहीं, बल्कि संपूर्ण सूचना-तंत्र के सामने है।
ऐसे समय में मुख्यधारा के मीडिया के पास स्वयं को पुनर्स्थापित करने का एक अवसर भी है। वह अपनी सबसे बड़ी ताकत-तथ्य-जांच, संपादकीय अनुशासन, संवाददाता नेटवर्क और संस्थागत उत्तरदायित्व को फिर से केंद्र में ला सकता है। यदि समाचार संस्थान अपनी गलतियों को खुले तौर पर स्वीकार करें, समय पर सुधार प्रकाशित करें, समाचार और विचार के बीच स्पष्ट विभाजन रखें तथा सभी पक्षों से समान कठोरता के साथ प्रश्न पूछें, तो खोया हुआ विश्वास धीरे-धीरे वापस पाया जा सकता है।
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न करना है। उसी प्रकार उसका उद्देश्य विपक्ष का समर्थन करना भी नहीं, बल्कि उससे भी जवाबदेही माँगना है। पत्रकारिता का वास्तविक धर्म किसी विचारधारा का विस्तार नहीं, बल्कि नागरिक के जानने के अधिकार की रक्षा करना है। यदि मीडिया स्वयं किसी राजनीतिक संघर्ष का सक्रिय पक्षकार दिखाई देने लगे, तो उसकी नैतिक शक्ति कमज़ोर पड़ जाती है।
आज आवश्यकता किसी एक चौनल, किसी एक एंकर या किसी एक विचारधारा को कटघरे में खड़ा करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम पत्रकारिता के मूल प्रश्न पर लौटें-क्या समाचार का पहला दायित्व सत्य के प्रति है, या दर्शकों की तात्कालिक उत्तेजना के प्रति? यदि उत्तर पहला है, तो पत्रकारिता को अपनी दिशा पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा।
भारतीय लोकतंत्र को आज भी एक मजबूत, स्वतंत्र और विश्वसनीय मीडिया की उतनी ही आवश्यकता है जितनी संविधान के निर्माण के समय थी। अंतर केवल इतना है कि अब सूचना की अधिकता के बीच सत्य की पहचान कठिन हो गई है। इसलिए आने वाले समय में वही मीडिया संस्थान टिकेंगे, जो सबसे तेज़ नहीं, बल्कि सबसे विश्वसनीय होंगे।
