चक्रव्यूह बनते कोचिंग सेंटर एवं भारतीय शिक्षण संस्थान

डॉ. वेदप्रकाश शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सेंटरों में भिन्न-भिन्न कारणों से विद्यार्थियों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे ऐसे कुछ

गालवलकर के एकात्म सांस्कृतिक राष्ट्र की अवधारणा बनाम समावेशी राष्ट्र व भारतीय संविधान का संघीय ढ़ंचा

गौतम चौधरी भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति, जातीय स्मृतियों और क्षेत्रीय अस्मिताओं का विराट संगम है। यही कारण है कि भारतीय

डॉ. कार्ल मार्क्स : ‘‘दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं होती जिसका भौतिक समाधान मौजूद न हो’’

सरदूल सिंह 5 मई 1818 को जर्मनी के त्रियेर शहर में जन्मे डॉ. कार्ल मार्क्स एक ऐसे महान दार्शनिक सिद्ध हुए जिनके विचारों ने न

न वैराग्य और न भयंकर उपभोग, मध्यमार्ग का सर्वोत्तम ग्रंथ है ‘पवित्र कुरान’

गौतम चौधरी इस्लामिक मान्यता के आधार पर पवित्र कुरान अल्लाह द्वारा अवतरित मार्गदर्शन की अंतिम पुस्तक है। यह ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता

प्रेस की स्वतंत्रता पर आई खतरनाक रिपोर्ट, भारत में भी नकारात्मक असर की चर्चा

गौतम चौधरी दुनिया के बदलते लोकतांत्रिक परिदृश्य में एक और चिंताजनक संकेत सामने आया है। Reporters Without Borders (RSF) की 2026 की रिपोर्ट बताती है

भारतीय ज्ञान परंपरा के वाहक और ‘‘भामती’’ ग्रंथ के रचयिता, महान दार्शनिक वाचस्पति मिश्र

गौतम चौधरी भारतीय दर्शन की परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके जीवन और कृतित्व में ज्ञान, तप और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम दिखाई

मई दिवस : आज एक बार फिर से श्रम अधिकारों की विरासत को बचाने जरूरत है

गौतम चौधरी इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो केवल स्मरण के लिए नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण के लिए लौटती हैं। 1 मई, मई दिवस,

क्या हम कृत्रिम मेधा के प्रयोग से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं?

डॉ. शैलेश शुक्ला मानव सभ्यता के इतिहास में तकनीकी क्रांतियों ने सदैव हमारे अस्तित्व की दिशा को बदला है किंतु वर्तमान में कृत्रिम मेधा यानी

ओरायन : तारामंडल से षड्यंत्र सिद्धांत तक, सच, मिथक और सोशल मीडिया का दुष्प्रचार

गौतम चौधरी आधुनिक समय में सोशल मीडिया ने ज्ञान के प्रसार को जितना आसान बनाया है, उतना ही भ्रम फैलाने का रास्ता भी खोल दिया

व्यापार से साम्राज्य तक : ईस्ट इंडिया कंपनी के उत्थान और भारत के विघटन की कहानी

गौतम चौधरी सत्रहवीं शताब्दी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के तटों पर पहुँची, तब वह किसी विजेता की मुद्रा में नहीं, बल्कि एक विनम्र

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