“मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार …. ” – एक कजरी में छिपी सांस्कृतिक विरासत, विरह, गिरमिटिया संघर्ष और सभ्यता की उदासी

गौतम चौधरी भारतीय लोकजीवन में कुछ गीत ऐसे होते हैं जो केवल गाए नहीं जाते, बल्कि पीढ़ियों तक एक समाज की स्मृति बनकर जीवित रहते

हो ची मिन्ह : मुक्ति के नायक और साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ राष्ट्रवादी संघर्ष के प्रतीक

गौतम चौधरी बीसवीं सदी का इतिहास ऐसे व्यक्तित्वों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने देशों की चित्र और नियति दोनों बदल दी। कुछ नेता केवल

इस्लाम में महिलाएं : कर्बला का जंग और ज़हरा व ज़ैनब की बेटियाँ

गौतम चौधरी दुनिया के हर समाज में महिलाओं की भूमिका पर बहस होती रही है, लेकिन मुस्लिम समाजों में यह बहस अक्सर दो वैचारिक चिंतनों

KGB : सत्ता, भय और निगरानी का सोवियत समाजवादी साम्राज्य

गौतम चौधरी  इतिहास में कुछ संस्थाएँ केवल सरकारी ढाँचे का हिस्सा नहीं होतीं, वे अपने समय की राजनीति, भय और सत्ता की मानसिकता का प्रतीक

टैगोर को महज एक महान कवि के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व का सतही मूल्यांकण होगा

बिरेन्द्र बांगरू रविन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर उन्हें केवल एक साहित्यिक महानायक या नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप में स्मरण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि

इस्लाम : दुनिया का पहला धर्म जहां महिलाओं के अधिकारों का मुकम्मल दस्तावेजीकरण हुआ

गौतम चौधरी समकालीन विश्व में जब भी महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा या राजनीतिक भागीदारी की चर्चा होती है, तो अक्सर यह धारणा सामने आती है

डॉ. कार्ल मार्क्स : ‘‘दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं होती जिसका भौतिक समाधान मौजूद न हो’’

सरदूल सिंह 5 मई 1818 को जर्मनी के त्रियेर शहर में जन्मे डॉ. कार्ल मार्क्स एक ऐसे महान दार्शनिक सिद्ध हुए जिनके विचारों ने न

भारतीय ज्ञान परंपरा के वाहक और ‘‘भामती’’ ग्रंथ के रचयिता, महान दार्शनिक वाचस्पति मिश्र

गौतम चौधरी भारतीय दर्शन की परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके जीवन और कृतित्व में ज्ञान, तप और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम दिखाई

22 अप्रैल 1870 को जन्मे महान दार्शनिक लेनिन की जयंती पर विशेष/ वैज्ञानिक समाजवाद के संस्थापक : महान लेनिन

सरदूल सिंह दुनिया के महान दार्शनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के निर्माताओं को जब याद किया जाता है तो महान लेनिन का नाम सबसे अग्रणी और

बिहार की कोकिला : लोकस्मृति में अमर विंध्यवासिनी देवी

रजनी चौधरी भारतीय लोकसंस्कृति की असली ताक़त उसकी जड़ों में बसती है, गाँवों की मिट्टी, लोकभाषाओं की मिठास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं

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